म्यूचुअल फ़ंड के प्रकार: इक्विटी, डेट, हाइब्रिड और इंडेक्स — आसान हिंदी में
भारत में हज़ारों म्यूचुअल फ़ंड स्कीमें हैं, पर SEBI ने उन्हें कुछ तय श्रेणियों में बाँट रखा है। हर श्रेणी का नियम है कि पैसा कहाँ और कितना लगेगा। श्रेणी समझ ली, तो किसी भी फ़ंड का नाम सुनकर आप जान जाएँगे कि वह है क्या — बिना किसी के बताए।
यहाँ किसी फ़ंड का नाम नहीं है, और "कौन सा सबसे अच्छा" भी नहीं। हर श्रेणी किसी के लिए सही है और किसी के लिए ग़लत — यह आपकी ज़रूरत, समय और जोखिम सहने की ताक़त पर निर्भर है। यह पेज सिर्फ़ यह बताता है कि कौन सी श्रेणी क्या है।
पहले तीन बातें जो हर फ़ंड पर लागू हैं
- लार्ज, मिड, स्मॉल कैप: मार्केट कैप के हिसाब से सबसे बड़ी 100 कंपनियाँ लार्ज कैप, अगली 150 मिड कैप, बाक़ी स्मॉल कैप।
- रिस्क-ओ-मीटर: हर फ़ंड को Low से Very High तक छह स्तरों में अपना जोखिम दिखाना होता है। फ़ॉर्म पर यह ज़रूर देखिए।
- हर श्रेणी में डायरेक्ट और रेगुलर प्लान: एक ही फ़ंड, अलग ख़र्च। निवेश की शुरुआत में विस्तार है।
इक्विटी फ़ंड — शेयरों वाले
| श्रेणी | पैसा कहाँ (SEBI की सीमा) | ध्यान रखिए |
|---|---|---|
| लार्ज कैप | कम से कम 80% बड़ी कंपनियों में | इंडेक्स से बेहतर करना इसके लिए मुश्किल रहा है, जबकि ख़र्च ज़्यादा |
| मिड कैप | कम से कम 65% मझोली कंपनियों में | उतार-चढ़ाव ज़्यादा |
| स्मॉल कैप | कम से कम 65% छोटी कंपनियों में | सबसे तेज़ गिरावट; कई साल का धैर्य चाहिए |
| लार्ज और मिड कैप | कम से कम 35-35% दोनों में | |
| मल्टी कैप | कुल कम से कम 75% शेयरों में, जिसमें कम से कम 25-25-25% लार्ज, मिड, स्मॉल | स्मॉल का हिस्सा हमेशा रहेगा |
| फ़्लेक्सी कैप | कम से कम 65% शेयरों में, किसी भी साइज़ की कंपनी | मैनेजर की मर्ज़ी पर बहुत कुछ |
| फ़ोकस्ड | ज़्यादा से ज़्यादा 30 शेयर; कम से कम 80% शेयरों में | कम शेयर = एक-एक शेयर का असर ज़्यादा |
| वैल्यू | सस्ते दिखते शेयर; कम से कम 80% शेयरों में | लंबे समय तक पीछे रह सकता है |
| कॉन्ट्रा | बाज़ार की चाल के उलट; कम से कम 80% शेयरों में | एक AMC दोनों रख सकती है, बशर्ते दोनों के पोर्टफ़ोलियो 50% से ज़्यादा एक जैसे न हों |
| डिविडेंड यील्ड | ज़्यादा डिविडेंड देने वाली कंपनियाँ; कम से कम 80% शेयरों में | डिविडेंड पर टैक्स आपकी स्लैब से |
| सेक्टोरल | कम से कम 80% एक सेक्टर में | सबसे संकरा दाँव |
| थीमैटिक | कम से कम 80% एक थीम में (थीम कई सेक्टर मिलाकर हो सकती है) | नई थीम अक्सर उफ़ान के वक़्त लॉन्च होती है। अब सेक्टोरल/थीमैटिक का पोर्टफ़ोलियो दूसरी इक्विटी स्कीमों से 50% से ज़्यादा मेल नहीं खा सकता |
| ELSS | कम से कम 80% शेयरों में, 3 साल का लॉक-इन | टैक्स छूट सिर्फ़ पुरानी टैक्स व्यवस्था में |
डेट फ़ंड — बॉन्ड और क़र्ज़ वाले काग़ज़
ये सरकार या कंपनियों को दिए क़र्ज़ (बॉन्ड, ट्रेज़री बिल वग़ैरह) में पैसा लगाते हैं। इनमें दो जोखिम हैं: ब्याज दर का जोखिम (लंबी अवधि वाले बॉन्ड की क़ीमत दरें बढ़ने पर ज़्यादा गिरती है) और क्रेडिट जोखिम (क़र्ज़ लेने वाला चुका न पाए)।
| श्रेणी | क्या | जोखिम का स्वभाव |
|---|---|---|
| ओवरनाइट | एक दिन में पकने वाले काग़ज़ | सबसे कम |
| लिक्विड | 91 दिन तक में पकने वाले काग़ज़ | कम; कई लोग इमरजेंसी के एक हिस्से के लिए देखते हैं |
| अल्ट्रा शॉर्ट टर्म | पोर्टफ़ोलियो की अवधि (Macaulay duration) 3–6 महीने | कम |
| अल्ट्रा शॉर्ट टू शॉर्ट टर्म | अवधि 6–12 महीने | कम से मध्यम |
| मनी मार्केट | एक साल तक में पकने वाले मनी मार्केट काग़ज़ | कम से मध्यम |
| शॉर्ट / मीडियम / मीडियम टू लॉन्ग / लॉन्ग टर्म | अवधि 1–3 साल / 3–4 / 4–7 / 7 साल से ज़्यादा | अवधि जितनी लंबी, ब्याज दर का असर उतना ज़्यादा |
| डायनेमिक टर्म | मैनेजर अवधि बदलता रहता है | मैनेजर के अंदाज़े पर निर्भर |
| कॉर्पोरेट बॉन्ड | कम से कम 80% AA+ और उससे ऊपर की रेटिंग वाले कंपनी बॉन्ड | क्रेडिट जोखिम कम |
| बैंकिंग और PSU | कम से कम 80% बैंक, PSU, सरकारी वित्तीय संस्थाओं और म्युनिसिपल बॉन्ड में | क्रेडिट जोखिम कम |
| क्रेडिट रिस्क | कम से कम 65% AA और उससे नीचे की रेटिंग वाले कंपनी बॉन्ड में (AA+ छोड़कर) | ज़्यादा ब्याज, ज़्यादा डूबने का ख़तरा — "डेट" नाम से सुरक्षित मत समझिए |
| गिल्ट | कम से कम 80% सरकारी प्रतिभूतियाँ | क्रेडिट जोखिम लगभग नहीं, पर ब्याज दर का जोखिम पूरा |
| 10 साल कॉन्स्टेंट मैच्योरिटी गिल्ट | कम से कम 80% सरकारी प्रतिभूतियाँ, अवधि 10 साल | ब्याज दर का जोखिम काफ़ी |
| फ़्लोटर | कम से कम 65% बदलती ब्याज दर वाले काग़ज़ | दरें बढ़ने पर कम असर |
| सेक्टोरल डेट (2026 में नई) | कम से कम 80% एक सेक्टर के AA+ और ऊपर वाले बॉन्ड — वित्त, ऊर्जा, इन्फ़्रा, हाउसिंग या रियल एस्टेट | एक सेक्टर पर निर्भरता |
हाइब्रिड फ़ंड — दोनों का मेल
| श्रेणी | शेयरों का हिस्सा | ध्यान रखिए |
|---|---|---|
| कंज़र्वेटिव हाइब्रिड | 10–25%, बाक़ी डेट | ज़्यादातर डेट जैसा |
| बैलेंस्ड हाइब्रिड | 40–60% | |
| एग्रेसिव हाइब्रिड | 65–80% | ज़्यादातर इक्विटी जैसा |
| डायनेमिक एसेट एलोकेशन / बैलेंस्ड एडवांटेज | बदलता रहता है | फ़ॉर्मूला या मैनेजर तय करता है |
| मल्टी एसेट | कम से कम तीन एसेट, हर एक में कम से कम 10% | सोना वग़ैरह भी हो सकता है |
| आर्बिट्राज | कम से कम 65% शेयरों में, नक़द और F&O बाज़ार के भाव का छोटा फ़र्क़ कमाने के लिए | डेट जैसा व्यवहार, पर इक्विटी की तरह टैक्स |
| इक्विटी सेविंग्स | कम से कम 65% शेयरों में, पर बिना हेज वाला हिस्सा सिर्फ़ 15–40%; कम से कम 10% डेट | शेयर, आर्बिट्राज और डेट का मिश्रण |
बाक़ी श्रेणियाँ
| श्रेणी | क्या |
|---|---|
| इंडेक्स फ़ंड | कम से कम 95% उसी इंडेक्स के शेयरों में, उसी अनुपात में; मैनेजर चुनाव नहीं करता, ख़र्च आमतौर पर सबसे कम |
| ETF | इंडेक्स फ़ंड जैसा, पर एक्सचेंज पर शेयर की तरह; डीमैट चाहिए |
| फ़ंड ऑफ़ फ़ंड्स (FoF) | कम से कम 95% दूसरे फ़ंड में; दोनों स्तरों का ख़र्च देखिए |
| लाइफ़ साइकिल फ़ंड (2026 में नई) | तय मैच्योरिटी तारीख़ वाला, लक्ष्य के लिए; समय के साथ शेयर से डेट की तरफ़ अपने आप खिसकता है (glide path) |
बंद हुई श्रेणी: रिटायरमेंट और चिल्ड्रन फ़ंड वाली "सॉल्यूशन-ओरिएंटेड" श्रेणी 26 फ़रवरी 2026 से बंद है। ऐसी पुरानी स्कीमें नया पैसा नहीं ले सकतीं और मिलती-जुलती स्कीमों में मिलाई जाएँगी। कोई आज भी "रिटायरमेंट फ़ंड" बेचे, तो पूछिए कि यह असल में किस श्रेणी में है।
एक्टिव बनाम पैसिव — सबसे ज़रूरी बहस
एक्टिव फ़ंड में मैनेजर इंडेक्स से बेहतर करने के लिए शेयर चुनता है, और इसकी फ़ीस लेता है। पैसिव फ़ंड (इंडेक्स फ़ंड, ETF) बस इंडेक्स को कॉपी करता है।
S&P की SPIVA जैसी नियमित रिपोर्टें बार-बार दिखाती हैं कि भारत में भी, ख़ासकर बड़ी कंपनियों वाली श्रेणी में, लंबे समय में ज़्यादातर एक्टिव फ़ंड अपने इंडेक्स से पीछे रहे। यह वही बात है जो इस साइट की हर जाँच में आती है: पिछले साल का विजेता चुनना संयोग की मशीन से विजेता चुनने जैसा है, पर ख़र्च हर साल पक्का कटता है।
इसका मतलब यह नहीं कि हर एक्टिव फ़ंड ख़राब है — इसका मतलब यह है कि ज़्यादा ख़र्च तभी ठीक है जब आपके पास यह मानने की ठोस वजह हो कि वह ख़र्च वसूल होगा।
फ़ंड के काग़ज़ों में क्या देखें
- श्रेणी — ऊपर की किस लाइन में है?
- रिस्क-ओ-मीटर — आपकी जोखिम सहने की ताक़त से मेल खाता है?
- Expense ratio — डायरेक्ट और रेगुलर दोनों का।
- एग्ज़िट लोड और लॉक-इन — कब तक पैसा बँधा रहेगा?
- बेंचमार्क — फ़ंड किस इंडेक्स से अपनी तुलना करता है, और लंबे समय में उससे कैसा रहा?
"पिछले एक साल का रिटर्न" इस सूची में सबसे आख़िर में आता है, और अक्सर बिल्कुल नहीं।
आगे पढ़िए
यह पेज सिर्फ़ जानकारी के लिए है, निवेश की सलाह नहीं। यहाँ किसी शेयर, फ़ंड, स्कीम, बीमा या ब्रोकर का नाम लेकर कोई सिफ़ारिश नहीं की गई है, और आगे कितना मिलेगा इसका कोई दावा नहीं है। नियम और टैक्स की दरें बदलती रहती हैं — कोई भी फ़ैसला लेने से पहले ताज़ा नियम ख़ुद जाँचिए।
हम SEBI में रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार या रिसर्च एनालिस्ट नहीं हैं। यह पूरा पेज AI ने लिखा है; उसमें ग़लती हो सकती है। बाज़ार में जोखिम है — कोई भी फ़ैसला लेने से पहले SEBI-रजिस्टर्ड सलाहकार से बात कीजिए।