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वेद · नौवाँ अध्याय · फ़ंड का ख़र्च

Expense ratio क्या है — म्यूचुअल फ़ंड का छिपा ख़र्च और SEBI की नई सीमा

ट्रेडिंग में हर सौदे पर ख़र्च दिखता था — STT, ब्रोकरेज, GST। म्यूचुअल फ़ंड में भी ख़र्च है, बस वह दिखता नहीं: हर दिन NAV से थोड़ा-थोड़ा कटता है। यह अध्याय उसी को दिखाता है — क्योंकि निवेश में यह उन गिनी-चुनी चीज़ों में है जो पहले से तय की जा सकती हैं।

पढ़ने में 8 मिनट 24 अक्टूबर 2026 100% AI द्वारा लिखा गया कोई सलाह नहीं
पहले यह पढ़ लीजिए

यह निवेश की सलाह नहीं है और यहाँ किसी फ़ंड का नाम नहीं है। सस्ता फ़ंड अपने आप "अच्छा" नहीं होता — पर ख़र्च वह चीज़ है जो हर साल कटता ही है, चाहे बाज़ार कुछ भी करे।

Expense ratio — एक लाइन में

फ़ंड चलाने का सालाना ख़र्च, फ़ंड की संपत्ति के प्रतिशत में। अगर किसी फ़ंड का expense ratio 1% है और आपके ₹1 लाख उसमें हैं, तो साल भर में लगभग ₹1,000 ख़र्च में जाते हैं — पर एक साथ नहीं, हर दिन का हिस्सा NAV से कटकर।

इसलिए कोई बिल नहीं आता, खाते में कोई "डेबिट" नहीं दिखता। फ़ंड का जो रिटर्न आप देखते हैं, वह ख़र्च कटने के बाद का है। ट्रेडिंग का ख़र्च हर सौदे पर चुभता था; यह ख़र्च चुपचाप चलता है — और सालों तक चलता है।

इसमें क्या-क्या आता है

SEBI (म्यूचुअल फ़ंड) नियम 2026 का नियम 66 गिनाता है कि फ़ंड पर कौन से ख़र्च डाले जा सकते हैं:

  • फ़ंड हाउस की मैनेजमेंट / सलाह फ़ीस
  • डिस्ट्रीब्यूटर का कमीशन और मार्केटिंग (रेगुलर प्लान में)
  • रजिस्ट्रार, ट्रस्टी, ऑडिट, कस्टोडियन की फ़ीस; खाते का स्टेटमेंट भेजने जैसे ख़र्च
  • सौदों का ब्रोकरेज, एक्सचेंज/क्लियरिंग के लेन-देन ख़र्च, और GST जैसे वैधानिक कर

इनके अलावा कोई भी ख़र्च फ़ंड हाउस, ट्रस्टी या स्पॉन्सर को ख़ुद उठाना होता है (नियम 66(11))। और नियम 67(2) के मुताबिक़ इन ख़र्चों और एग्ज़िट लोड के सिवा निवेशक से कोई और चार्ज नहीं लिया जा सकता।

1 अप्रैल 2026 से नया ढाँचा: बेस + बाक़ी

नए नियमों में ख़र्च दो हिस्सों में बँट गया है:

  • बेस expense ratio (BER): फ़ंड चलाने के ख़र्च — इसी पर SEBI की सीमा लगती है।
  • उसके ऊपर: ब्रोकरेज (कैश मार्केट सौदों पर सौदे के मूल्य का अधिकतम 0.06%, डेरिवेटिव पर 0.02%; इससे ज़्यादा हो तो वह बेस के अंदर गिना जाता है), एक्सचेंज-क्लियरिंग के लेन-देन ख़र्च, और GST जैसे वैधानिक कर।

इन सबका जोड़ टोटल expense ratio (TER) है — यानी आपसे असल में कितना कट रहा है, वह TER बताता है, BER नहीं।

ओपन-एंडेड स्कीमबेस expense ratio की अधिकतम सीमा (रोज़ की संपत्ति का %)
इंडेक्स फ़ंड और ETFइंडेक्स फ़ंड और ETF: 0.90%
इक्विटी फ़ंड — पहले ₹500 करोड़ परइक्विटी, पहले ₹500 करोड़: 2.10%
इक्विटी फ़ंड — अगले ₹250 करोड़1.90%
इक्विटी फ़ंड — अगले ₹1,250 करोड़1.60%
इक्विटी फ़ंड — अगले ₹3,000 करोड़1.50%
इक्विटी फ़ंड — अगले ₹5,000 करोड़1.40%
इक्विटी फ़ंड — अगले ₹40,000 करोड़हर ₹5,000 करोड़ पर 0.05% कम
इक्विटी फ़ंड — बाक़ी संपत्तिइक्विटी, बाक़ी संपत्ति: 0.95%
डेट व अन्य (ग़ैर-इक्विटी) — पहले ₹500 करोड़ से बाक़ी तक1.85% से 0.70%
स्रोत: SEBI (म्यूचुअल फ़ंड) नियम 2026, नियम 66(7)(b)–(c)। ये ऊपरी सीमाएँ हैं — कई फ़ंड इससे कम लेते हैं, ख़ासकर डायरेक्ट प्लान में। किसी फ़ंड का असली आँकड़ा उसके फ़ंड हाउस या AMFI की साइट पर देखिए।

एक बात ध्यान देने की: सीमा फ़ंड के आकार से घटती है, आपके निवेश से नहीं। बड़े फ़ंड पर सीमा कम है क्योंकि उसका ख़र्च ज़्यादा पैसे पर बँट जाता है।

1% का फ़र्क़ — 20 साल में कितना

मान लीजिए ₹10 लाख एक बार लगाए गए, 20 साल के लिए, और फ़ंड का पोर्टफ़ोलियो ख़र्च से पहले हर साल 8% बढ़ता है। यह 8% कोई अनुमान या वादा नहीं — सिर्फ़ गणित दिखाने के लिए एक मान्यता है। अब सिर्फ़ ख़र्च बदलिए:

सालाना ख़र्चख़र्च के बाद की बढ़त20 साल बाद (काल्पनिक)
0.2%7.8%₹44.9 लाख
1%7%₹38.7 लाख
2%6%₹32.1 लाख
एक ही पोर्टफ़ोलियो, एक ही बाज़ार — फ़र्क़ सिर्फ़ ख़र्च का। 0.2% और 2% के बीच लगभग ₹12.8 लाख। बिना टैक्स, बिना महँगाई; असली नतीजा इनमें से कुछ भी नहीं हो सकता, नुकसान भी।

बाज़ार अगले 20 साल क्या करेगा, कोई नहीं जानता। पर ख़र्च पहले से पता होता है और हर साल कटता है — बाज़ार ऊपर जाए या नीचे। इसीलिए यह अध्याय अलग से है।

अपना हिसाब — दो ख़र्च, एक रक़म

अपनी रक़म, समय और मान्यता डालिए, फिर दो expense ratio — जैसे एक ही फ़ंड का डायरेक्ट और रेगुलर प्लान। कैलकुलेटर सिर्फ़ गणित करता है; कुछ भी कहीं भेजा या सेव नहीं होता।

यह आपकी मान्यता है, हमारा अंदाज़ा नहीं। किसी साल नुकसान भी होता है।

डायरेक्ट बनाम रेगुलर — फ़र्क़ कहाँ से आता है

एक ही फ़ंड के दो प्लान होते हैं, पैसा एक ही पोर्टफ़ोलियो में लगता है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि रेगुलर प्लान के ख़र्च में डिस्ट्रीब्यूटर का कमीशन जुड़ा होता है। इसलिए दोनों का NAV अलग होता है, और रेगुलर का NAV हर साल थोड़ा पीछे रह जाता है।

डिस्ट्रीब्यूटर से काग़ज़ी काम, याद दिलाने और गिरावट में हाथ थामने जैसी मदद मिल सकती है — कई लोगों के लिए यह क़ीमत चुकाने लायक़ है। बस यह जानकर चुनिए कि वह क़ीमत हर साल, सालों तक कटती है। ऊपर के कैलकुलेटर में दोनों प्लान के आँकड़े डालकर ख़ुद देखिए।

इंडेक्स फ़ंड सस्ता क्यों होता है

इंडेक्स फ़ंड किसी इंडेक्स (जैसे निफ़्टी 50) के शेयर उसी अनुपात में ख़रीदता है — कौन सा शेयर ख़रीदना है, यह फ़ैसला नहीं करना पड़ता। कम रिसर्च, कम सौदे, इसलिए कम ख़र्च; नियम भी इसकी सीमा 0.90% रखते हैं।

दो बातें फिर भी देखिए:

  • ट्रैकिंग का अंतर: इंडेक्स फ़ंड इंडेक्स जितना ही नहीं, ख़र्च और नक़दी की वजह से उससे थोड़ा पीछे रहता है। फ़ंड हाउस यह अंतर (tracking difference / tracking error) बताते हैं।
  • इंडेक्स भी गिरता है: सस्ता फ़ंड बाज़ार के जोखिम से नहीं बचाता। गिरावट में इंडेक्स फ़ंड भी लगभग उतना ही गिरेगा जितना इंडेक्स।

फ़ंड की श्रेणियाँ समझने के लिए: म्यूचुअल फ़ंड के प्रकार।

ट्रेडर के लिए तुलना

F&O में ख़र्च हर सौदे पर लगता है — दिन में दस सौदे तो दस बार। ऑप्शन ट्रेडर का साल भर का ख़र्च अक्सर पूँजी के कई प्रतिशत तक पहुँच जाता है; अपना आँकड़ा हर सौदे का ख़र्च कैलकुलेटर में गिनिए। म्यूचुअल फ़ंड में ख़र्च ऊपर की सीमाओं के भीतर, साल का एक तय प्रतिशत होता है, और सौदों की गिनती से नहीं बढ़ता।

यह तुलना इसलिए नहीं कि फ़ंड में पैसा बढ़ना तय है — ऐसा कोई नहीं कह सकता। बल्कि इसलिए कि ख़र्च वह हिस्सा है जो आपके हाथ में है, और ट्रेडिंग में वही हिस्सा सबसे तेज़ी से बढ़ता है।

आगे का रास्ता

  1. अपना हिसाब — ट्रेडिंग का असली नतीजा, एक बार ईमानदारी से।
  2. F&O कैसे छोड़ें — आठ व्यावहारिक क़दम।
  3. निवेश की शुरुआत — इमरजेंसी फ़ंड → बीमा → क़र्ज़ → निवेश का क्रम।

किस्तों में या एक साथ: SIP या एकमुश्त · टैक्स: टैक्स का पूरा हिसाब

ज़रूरी सूचना

यह पेज सिर्फ़ जानकारी के लिए है, निवेश की सलाह नहीं। यहाँ किसी शेयर, फ़ंड, स्कीम, बीमा या ब्रोकर का नाम लेकर कोई सिफ़ारिश नहीं की गई है, और आगे कितना मिलेगा इसका कोई दावा नहीं है। नियम और टैक्स की दरें बदलती रहती हैं — कोई भी फ़ैसला लेने से पहले ताज़ा नियम ख़ुद जाँचिए।

हम SEBI में रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार या रिसर्च एनालिस्ट नहीं हैं। यह पूरा पेज AI ने लिखा है; उसमें ग़लती हो सकती है। बाज़ार में जोखिम है — कोई भी फ़ैसला लेने से पहले SEBI-रजिस्टर्ड सलाहकार से बात कीजिए।